झांसी की पहली महिला ऑटो रिक्शा चालक अनीता चौधरी की हत्या ने देश में महिला सुरक्षा पर बहस छेड़ दी है। उत्तर प्रदेश की इस घटना ने असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था की ख़ामियों को उजागर करने का…
झांसी की पहली महिला ऑटो रिक्शा चालक अनीता चौधरी की हत्या ने देश में महिला सुरक्षा पर बहस छेड़ दी है। उत्तर प्रदेश की इस घटना ने असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था की ख़ामियों को उजागर करने का…
थिएटर परंपरा को मज़बूती देने वालों में रति बार्थोलोम्यू का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। वह एक निर्देशक, अभिनेत्री, नाटककार और बुद्धिजीवी रंगमंच कलाकार थीं ।
थिएटर परंपरा को मज़बूती देने वालों में रति बार्थोलोम्यू का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। वह एक निर्देशक, अभिनेत्री, नाटककार और बुद्धिजीवी रंगमंच कलाकार थीं ।
चेतना का आधार तो डॉक्टर अंबेडकर का चिंतन है। वहां से हम लोग अपना आधार लेते हैं। जो मनुष्यता को निर्मित करने पर केंद्रित है। निश्चित तौर पर हमारा जो समाज है। वो विभिन्न तरह के खांचों में बंटा हुआ है और आज भी उस खांचे की जो खाई है, वो हम…
चेतना का आधार तो डॉक्टर अंबेडकर का चिंतन है। वहां से हम लोग अपना आधार लेते हैं। जो मनुष्यता को निर्मित करने पर केंद्रित है। निश्चित तौर पर हमारा जो समाज है। वो विभिन्न तरह के खांचों में बंटा हुआ है और आज भी उस खांचे की जो खाई है, वो हम…
जब बॉलीवुड और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर ज़्यादातर पिता-पुत्र की कहानियां भी मर्दानगी और ताक़त के इर्द-गिर्द घूमती हैं, वहीं 'सिंगल पापा' एक मर्द को संवेदनशील, डरे हुए और बच्चे की देखभाल में जूझते हुए दिखाने की कोशिश अच्छी कर …
जब बॉलीवुड और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर ज़्यादातर पिता-पुत्र की कहानियां भी मर्दानगी और ताक़त के इर्द-गिर्द घूमती हैं, वहीं 'सिंगल पापा' एक मर्द को संवेदनशील, डरे हुए और बच्चे की देखभाल में जूझते हुए दिखाने की कोशिश अच्छी कर …
भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों में कार्यरत महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। लेकिन कैंपस का माहौल, कई महिलाओं के लिए असुरक्षा, भेदभाव और मानसिक दबाव का केंद्र भी बन जाता है। कैंपस में काम करने वाली महिलाएं जेंडर आधारित…
भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों में कार्यरत महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। लेकिन कैंपस का माहौल, कई महिलाओं के लिए असुरक्षा, भेदभाव और मानसिक दबाव का केंद्र भी बन जाता है। कैंपस में काम करने वाली महिलाएं जेंडर आधारित…
साउथ एशियन थेरपिस्ट कलेक्टिव की एक रिपोर्ट बताती है कि दक्षिण एशियाई समाजों में लड़कियों को बचपन से ही ‘अच्छी बेटी’ बनने की ट्रेनिंग दी जाती है। परिवार और समाज उनसे उम्मीद करते हैं कि वे अपनी भावनाओं को दबाकर रखें। भारतीय सामाजिक…
साउथ एशियन थेरपिस्ट कलेक्टिव की एक रिपोर्ट बताती है कि दक्षिण एशियाई समाजों में लड़कियों को बचपन से ही ‘अच्छी बेटी’ बनने की ट्रेनिंग दी जाती है। परिवार और समाज उनसे उम्मीद करते हैं कि वे अपनी भावनाओं को दबाकर रखें। भारतीय सामाजिक…
डिजिटल तकनीक और ऑनलाइन डेटिंग ऐप्स ने क्वीयर समुदाय के लिए जुड़ाव, बातचीत और पहचान के नए अवसर खोले हैं, खासतौर पर, उस जगह पर जहां सार्वजनिक जीवन में क्वीयर अस्तित्व अब भी हाशिए पर है। लेकिन ये प्लेटफ़ॉर्म केवल संभावनाओं का…
डिजिटल तकनीक और ऑनलाइन डेटिंग ऐप्स ने क्वीयर समुदाय के लिए जुड़ाव, बातचीत और पहचान के नए अवसर खोले हैं, खासतौर पर, उस जगह पर जहां सार्वजनिक जीवन में क्वीयर अस्तित्व अब भी हाशिए पर है। लेकिन ये प्लेटफ़ॉर्म केवल संभावनाओं का…
वेडिंग इंफ्लुएंसर संस्कृति इस दबाव को और सामान्य बना देती है। शादी अब निजी रिश्ता नहीं, एक मार्केटेबल इवेंट बन जाती है। दुल्हन का लुक, वेन्यू, डिज़ाइनर और फ़ोटोग्राफ़र सब टैग किए जाते हैं। भावनाएं भी कंटेंट बन जाती हैं। अक्सर यह…
वेडिंग इंफ्लुएंसर संस्कृति इस दबाव को और सामान्य बना देती है। शादी अब निजी रिश्ता नहीं, एक मार्केटेबल इवेंट बन जाती है। दुल्हन का लुक, वेन्यू, डिज़ाइनर और फ़ोटोग्राफ़र सब टैग किए जाते हैं। भावनाएं भी कंटेंट बन जाती हैं। अक्सर यह…
संस्थानों में आंतरिक शिकायत समितियां और कानून मौजूद हैं, लेकिन उनकी पहुंच, संवेदनशीलता और भरोसेमंद प्रक्रिया पर सवाल बने रहते हैं। कई बार शिकायत करने पर सहयोग के बजाय चुप रहने की सलाह मिलती है, जो संस्थागत विफलता को उजागर करता…
संस्थानों में आंतरिक शिकायत समितियां और कानून मौजूद हैं, लेकिन उनकी पहुंच, संवेदनशीलता और भरोसेमंद प्रक्रिया पर सवाल बने रहते हैं। कई बार शिकायत करने पर सहयोग के बजाय चुप रहने की सलाह मिलती है, जो संस्थागत विफलता को उजागर करता…
तारो की शादी 13 साल की उम्र में कर दी गई थी। गरीबी, अधूरे सपनों और घर बनाने की जद्दोजहद, मज़ाक, ताने और बेरोज़गारी के बोझ ने उसके पति रामलाल को भी भीतर से तोड़ दिया था। पति की मौत के बाद तारो को समाज और परिवार हर जगह से…
तारो की शादी 13 साल की उम्र में कर दी गई थी। गरीबी, अधूरे सपनों और घर बनाने की जद्दोजहद, मज़ाक, ताने और बेरोज़गारी के बोझ ने उसके पति रामलाल को भी भीतर से तोड़ दिया था। पति की मौत के बाद तारो को समाज और परिवार हर जगह से…
पहाड़ में असोज सबसे ज्यादा काम का शारीरिक और मानसिक दबाव लेकर आता है, जिसका ज्यादातर दबाव महिलाओं के ऊपर होता है। यह वह समय है, जब खेती हो रही होती है,उसे समेटना,जानवरों के लिए घास काटना,उसके बाद हरी घास को काटकर सुखाना, जो कि बहुत ही कठिन…
पहाड़ में असोज सबसे ज्यादा काम का शारीरिक और मानसिक दबाव लेकर आता है, जिसका ज्यादातर दबाव महिलाओं के ऊपर होता है। यह वह समय है, जब खेती हो रही होती है,उसे समेटना,जानवरों के लिए घास काटना,उसके बाद हरी घास को काटकर सुखाना, जो कि बहुत ही कठिन…
निर्मल कौर वो महिला हैं, जिन्होंने भारतीय महिला वॉलीबॉल में नेतृत्व, दृढ़ता और सौम्यता की मिसाल पेश की थीं। निर्मल कौर सैनी का जीवन संघर्ष, मेहनत और उपलब्धियों से भरा रहा।
निर्मल कौर वो महिला हैं, जिन्होंने भारतीय महिला वॉलीबॉल में नेतृत्व, दृढ़ता और सौम्यता की मिसाल पेश की थीं। निर्मल कौर सैनी का जीवन संघर्ष, मेहनत और उपलब्धियों से भरा रहा।
औद्योगिक क्रांति के बाद सौंदर्य प्रसाधन एक ‘वस्तु’ बन गए। इन्हें बड़े पैमाने पर बनाया और बेचा जाने लगा। बीसवीं सदी में विज्ञापन उद्योग ने इन्हें उपभोक्तावाद से जोड़ दिया। यहीं से कॉस्मेटिक इंडस्ट्री और पर्यावरण प्रदूषण के बीच एक खतरनाक रिश्ता शुरू हुआ।
औद्योगिक क्रांति के बाद सौंदर्य प्रसाधन एक ‘वस्तु’ बन गए। इन्हें बड़े पैमाने पर बनाया और बेचा जाने लगा। बीसवीं सदी में विज्ञापन उद्योग ने इन्हें उपभोक्तावाद से जोड़ दिया। यहीं से कॉस्मेटिक इंडस्ट्री और पर्यावरण प्रदूषण के बीच एक खतरनाक रिश्ता शुरू हुआ।
साल 1980 के दशक में, जब महिला पात्रों को अक्सर त्याग और चुप्पी का प्रतीक दिखाया जाता था, तब मंजू जैसी नायिका का सामने आना ज़रूरी था। वह परिवार को तोड़ती नहीं, बल्कि उसे मानवीय बनाती है। फिल्म यह संदेश देती है कि एक महिला…
साल 1980 के दशक में, जब महिला पात्रों को अक्सर त्याग और चुप्पी का प्रतीक दिखाया जाता था, तब मंजू जैसी नायिका का सामने आना ज़रूरी था। वह परिवार को तोड़ती नहीं, बल्कि उसे मानवीय बनाती है। फिल्म यह संदेश देती है कि एक महिला…
आजकल सोशल मीडिया में भी एंटी-एजिंग क्रीम, सीरम, कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट और युवा बनाये रखने के वादों से भरे विज्ञापन यह संदेश देते हैं, कि झुर्रियां और सफेद बाल या उम्र का बढना सही नहीं है और इन्हें ठीक करने की ज़रूरत है।…
आजकल सोशल मीडिया में भी एंटी-एजिंग क्रीम, सीरम, कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट और युवा बनाये रखने के वादों से भरे विज्ञापन यह संदेश देते हैं, कि झुर्रियां और सफेद बाल या उम्र का बढना सही नहीं है और इन्हें ठीक करने की ज़रूरत है।…
हिमाचल प्रदेश की हालिया घटना हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई सामने रखती है। भारत में जातिवाद के कारण एक दलित महिला कहीं ज़्यादा कठिन है। जाति और जेंडर मिलकर ऐसा दबाव बनाते हैं, जिसमें दलित महिलाओं की आवाज़ आसानी से दबा दी जाती है।
हिमाचल प्रदेश की हालिया घटना हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई सामने रखती है। भारत में जातिवाद के कारण एक दलित महिला कहीं ज़्यादा कठिन है। जाति और जेंडर मिलकर ऐसा दबाव बनाते हैं, जिसमें दलित महिलाओं की आवाज़ आसानी से दबा दी जाती है।
स्कूली शिक्षा के दौरान मुझे अपनी शारीरिक बनावट और 'ड्रेसिंग सेंस' के प्रति अच्छा महसूस नहीं होता था। मैंने बचपन से ही बॉडी शेमिंग का सामना किया है, क्योंकि मेरी शारीरिक बनावट हमेशा से ही स्लिम रही है। माता-पिता, रिश्तेदारों और…
स्कूली शिक्षा के दौरान मुझे अपनी शारीरिक बनावट और 'ड्रेसिंग सेंस' के प्रति अच्छा महसूस नहीं होता था। मैंने बचपन से ही बॉडी शेमिंग का सामना किया है, क्योंकि मेरी शारीरिक बनावट हमेशा से ही स्लिम रही है। माता-पिता, रिश्तेदारों और…
आज हिन्दी सिनेमा के 100 से भी ज्यादा साल पूरे हो चुके हैं। लेकिन ट्रांसजेंडर लोगों का जीवन, उनकी समस्याओं, उनकी सामाजिक स्थिति, समाज का उनके प्रति नजरिया, उनके प्रति किए जा रहे अमानवीय व्यवहारों को कभी भी सही तरीके से व्यक्त…
आज हिन्दी सिनेमा के 100 से भी ज्यादा साल पूरे हो चुके हैं। लेकिन ट्रांसजेंडर लोगों का जीवन, उनकी समस्याओं, उनकी सामाजिक स्थिति, समाज का उनके प्रति नजरिया, उनके प्रति किए जा रहे अमानवीय व्यवहारों को कभी भी सही तरीके से व्यक्त…
नुपी लान आंदोलन, मणिपुरी भाषा में इसका अर्थ है ‘महिलाओं का संघर्ष’। यह एक ऐसा आंदोलन था, जिसे आम महिलाओं ने अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी, घर-परिवार और आजीविका को बचाने के लिए किया था।
नुपी लान आंदोलन, मणिपुरी भाषा में इसका अर्थ है ‘महिलाओं का संघर्ष’। यह एक ऐसा आंदोलन था, जिसे आम महिलाओं ने अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी, घर-परिवार और आजीविका को बचाने के लिए किया था।
यह किताब साबित करती है कि उनकी ज़िंदगी बिल्कुल भी मामूली नहीं थी। इसमें प्रगतिशील लेखन की जद्दोजहद, विभाजन की त्रासदी और उस समय के एक असंभव-से प्रेम की कहानी दर्ज है।
यह किताब साबित करती है कि उनकी ज़िंदगी बिल्कुल भी मामूली नहीं थी। इसमें प्रगतिशील लेखन की जद्दोजहद, विभाजन की त्रासदी और उस समय के एक असंभव-से प्रेम की कहानी दर्ज है।
साल 2025 बस खत्म होने को है। हर साल की तरह इस साल भी फेमिनिज़म इन इंडिया आपके लिए लेकर आया है उन बेहतरीन 25 लेखों की सूची जिन्हें आपने सबसे ज्यादा पसंद किया और पढ़ा।
साल 2025 बस खत्म होने को है। हर साल की तरह इस साल भी फेमिनिज़म इन इंडिया आपके लिए लेकर आया है उन बेहतरीन 25 लेखों की सूची जिन्हें आपने सबसे ज्यादा पसंद किया और पढ़ा।
साल 2025 भारतीय न्यायपालिका के लिए ऐसा ही एक अहम वर्ष रहा। इस दौरान अदालतों ने महिलाओं, ट्रांसजेंडर समुदाय और आदिवासी महिलाओं के अधिकारों को मज़बूत करने वाले कई महत्वपूर्ण फैसले सुनाए।
साल 2025 भारतीय न्यायपालिका के लिए ऐसा ही एक अहम वर्ष रहा। इस दौरान अदालतों ने महिलाओं, ट्रांसजेंडर समुदाय और आदिवासी महिलाओं के अधिकारों को मज़बूत करने वाले कई महत्वपूर्ण फैसले सुनाए।
अगर फ़िल्म को सतह से थोड़ा भीतर उतरकर देखा जाए, तो यह पूरी तरह एक राजनीतिक फ़िल्म नज़र आती है। समय की आहट इसमें लगातार महसूस होती है। यह भी महत्वपूर्ण है कि यह एक महिला निर्देशक की फ़िल्म है।
अगर फ़िल्म को सतह से थोड़ा भीतर उतरकर देखा जाए, तो यह पूरी तरह एक राजनीतिक फ़िल्म नज़र आती है। समय की आहट इसमें लगातार महसूस होती है। यह भी महत्वपूर्ण है कि यह एक महिला निर्देशक की फ़िल्म है।
साल 2025 के कैंपस आंदोलन यह दिखाते हैं कि छात्र आज भी सुरक्षा, समानता और न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं। फीस बढ़ोतरी, भेदभाव, असुरक्षा और प्रशासनिक लापरवाही ने छात्रों को सड़कों पर उतरने को मजबूर किया।
साल 2025 के कैंपस आंदोलन यह दिखाते हैं कि छात्र आज भी सुरक्षा, समानता और न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं। फीस बढ़ोतरी, भेदभाव, असुरक्षा और प्रशासनिक लापरवाही ने छात्रों को सड़कों पर उतरने को मजबूर किया।
जाति के नाम पर होने वाली हिंसा और भेदभाव न केवल हाशिये पर रह रहे समुदायों के दैनिक जीवन को कठिन बनाते हैं, बल्कि उनके मानवाधिकारों का भी हनन करते हैं। इस लेख में हम ऐसी ही कुछ घटनाओं पर बात करेंगे, जहां हाशिये पर रह रहे समुदाय के…
जाति के नाम पर होने वाली हिंसा और भेदभाव न केवल हाशिये पर रह रहे समुदायों के दैनिक जीवन को कठिन बनाते हैं, बल्कि उनके मानवाधिकारों का भी हनन करते हैं। इस लेख में हम ऐसी ही कुछ घटनाओं पर बात करेंगे, जहां हाशिये पर रह रहे समुदाय के…