पीले पत्ते झड़ते हैं आज
ढलता हुआ सूरज
क़ब्र मे दफ्न औलाद
कांच की तड़क
आग का स्वाद
पीठ पीछे चुगली
कटी हुई उंगली
अस्पताल की खामोशी मे
बिलकने की आवाज़
शहर से दूर गांव का तालाब
देना पड़ता है सबको ,
पाई पाई का हिसाब ।
पीले पत्ते झड़ते हैं आज
ढलता हुआ सूरज
क़ब्र मे दफ्न औलाद
कांच की तड़क
आग का स्वाद
पीठ पीछे चुगली
कटी हुई उंगली
अस्पताल की खामोशी मे
बिलकने की आवाज़
शहर से दूर गांव का तालाब
देना पड़ता है सबको ,
पाई पाई का हिसाब ।