Indra Kumar Verma
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Indra Kumar Verma
@vermag.bsky.social
मुहानी हो मरती नदी
पीले पत्ते झड़ते हैं आज
ढलता हुआ सूरज
क़ब्र मे दफ्न औलाद
कांच की तड़क
आग का स्वाद
पीठ पीछे चुगली
कटी हुई उंगली
अस्पताल की खामोशी मे
बिलकने की आवाज़
शहर से दूर गांव का तालाब
देना पड़ता है सबको ,
पाई पाई का हिसाब ।
September 28, 2025 at 7:02 PM