Jaipur, India.
जैसे एहसाँ उतारता है कोई
दिल में कुछ यूँ सँभालता हूँ ग़म
जैसे ज़ेवर सँभालता है कोई
देर से गूँजते हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई
- गुलज़ार
जैसे एहसाँ उतारता है कोई
दिल में कुछ यूँ सँभालता हूँ ग़म
जैसे ज़ेवर सँभालता है कोई
देर से गूँजते हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई
- गुलज़ार
वो सर-ए-आम हो रही है अब
शब ग़नीमत थी लोग कहते हैं
सुब्ह बदनाम हो रही है अब
- दुष्यंत कुमार
वो सर-ए-आम हो रही है अब
शब ग़नीमत थी लोग कहते हैं
सुब्ह बदनाम हो रही है अब
- दुष्यंत कुमार
एक सूखते हुए वृक्ष की फुनगी पर
महज तीन-चार पत्तों का हिलना
उस विकट सुखाड़ में
सृष्टि पर पहरा दे रहे थे
तीन-चार पत्ते
- केदारनाथ सिंह
एक सूखते हुए वृक्ष की फुनगी पर
महज तीन-चार पत्तों का हिलना
उस विकट सुखाड़ में
सृष्टि पर पहरा दे रहे थे
तीन-चार पत्ते
- केदारनाथ सिंह
आज रोया दिल-ए-महजूर बहुत
दूर है सुब्ह शब-ए-ग़म ऐ दिल
है सितारों मैं अभी नूर बहुत
- तिलोकचंद महरूम
आज रोया दिल-ए-महजूर बहुत
दूर है सुब्ह शब-ए-ग़म ऐ दिल
है सितारों मैं अभी नूर बहुत
- तिलोकचंद महरूम
उस को देखे मिरी नज़र से कोई
- शहरयार
उस को देखे मिरी नज़र से कोई
- शहरयार
हर किसी के सामने हम हाथ फैलाते नहीं
- शबाना नज़ीर
हर किसी के सामने हम हाथ फैलाते नहीं
- शबाना नज़ीर
वो मिल गया है मैं खोया हुआ सा लगता हूँ
मिरी हँसी से उदासी के फूल खिलते हैं
मैं सब के साथ हूँ लेकिन जुदा सा लगता हूँ
तमाम रात बरसती है रेत पर शबनम
मैं अपने चाँद से जब भी ख़फ़ा सा लगता हूँ
- बशीर बद्र
वो मिल गया है मैं खोया हुआ सा लगता हूँ
मिरी हँसी से उदासी के फूल खिलते हैं
मैं सब के साथ हूँ लेकिन जुदा सा लगता हूँ
तमाम रात बरसती है रेत पर शबनम
मैं अपने चाँद से जब भी ख़फ़ा सा लगता हूँ
- बशीर बद्र
तेरी आवाज़ अभी क़ैद है दरबारों में
धूप की आग में हँसने की अदा क्या जानें
जंगली फूल कहाँ आप के गुलज़ारों में
- बशीर बद्र
तेरी आवाज़ अभी क़ैद है दरबारों में
धूप की आग में हँसने की अदा क्या जानें
जंगली फूल कहाँ आप के गुलज़ारों में
- बशीर बद्र
हम ने तो सहरा में बसर की तुम ने गुज़ारी रात कहाँ
मेरी आबला-पाई उन में याद अक्सर की जाती है
काँटों ने इक मुद्दत से देखी थी कोई बरसात कहाँ
- राही मासूम रज़ा
हम ने तो सहरा में बसर की तुम ने गुज़ारी रात कहाँ
मेरी आबला-पाई उन में याद अक्सर की जाती है
काँटों ने इक मुद्दत से देखी थी कोई बरसात कहाँ
- राही मासूम रज़ा
और मेहमान नवाज़ी करना भूल गयी
- अमृता प्रीतम
और मेहमान नवाज़ी करना भूल गयी
- अमृता प्रीतम
कविताएँ लिखता आ रहा हूँ
अब कोई पूछे मुझसे
कि क्या मिलता है तुम्हें ऐसा
कविताएँ लिखने से
जैसे अभी दो मिनट पहले
जब मैं कविता लिखने नहीं बैठा था
तब काग़ज़ काग़ज़ था
मैं मैं था
और कलम कलम
मगर जब लिखने बैठा
तो तीन नहीं रहे हम
एक हो गए
- भवानीप्रसाद मिश्र
कविताएँ लिखता आ रहा हूँ
अब कोई पूछे मुझसे
कि क्या मिलता है तुम्हें ऐसा
कविताएँ लिखने से
जैसे अभी दो मिनट पहले
जब मैं कविता लिखने नहीं बैठा था
तब काग़ज़ काग़ज़ था
मैं मैं था
और कलम कलम
मगर जब लिखने बैठा
तो तीन नहीं रहे हम
एक हो गए
- भवानीप्रसाद मिश्र
सो भी इक उम्र में हुआ मालूम
- मीर तक़ी मीर
सो भी इक उम्र में हुआ मालूम
- मीर तक़ी मीर
वह जिसे पाना है।
ग़लती उसी दूरी को समझने में थी
- कुॅंवर नारायण
वह जिसे पाना है।
ग़लती उसी दूरी को समझने में थी
- कुॅंवर नारायण
वर्ना कोई ऐसे तो सफ़र में नहीं रहता
- वसीम बरेलवी
वर्ना कोई ऐसे तो सफ़र में नहीं रहता
- वसीम बरेलवी
कहीं से आता हुआ कोई शहसवार दिखे
कोई तिलिस्मी सिफ़त थी जो इस हुजूम में वो
हुए जो आँख से ओझल तो बार बार दिखे
- गुलज़ार
कहीं से आता हुआ कोई शहसवार दिखे
कोई तिलिस्मी सिफ़त थी जो इस हुजूम में वो
हुए जो आँख से ओझल तो बार बार दिखे
- गुलज़ार
जाने किस किस से गिला था पहले
- निदा फ़ाज़ली
जाने किस किस से गिला था पहले
- निदा फ़ाज़ली
इस तरह बर्फ़ गिरती रहेगी कि दरिया ठहर जाएँगे
- राजेन्द्र मनचंदा बानी
इस तरह बर्फ़ गिरती रहेगी कि दरिया ठहर जाएँगे
- राजेन्द्र मनचंदा बानी
हवा जग जग के सोती है पथिक अब कौन चलता है
न कुछ भी धूल धक्कड़ हो तो पथ कैसे चला जाए
कहा है चिकने पत्थर पर क़दम जा कर फिसलता है
- त्रिलोचन
हवा जग जग के सोती है पथिक अब कौन चलता है
न कुछ भी धूल धक्कड़ हो तो पथ कैसे चला जाए
कहा है चिकने पत्थर पर क़दम जा कर फिसलता है
- त्रिलोचन
पहले ये तय हो कि इस घर को बचाएँ कैसे
क़हक़हा आँख का बरताव बदल देता है
हँसने वाले तुझे आँसू नज़र आएँ कैसे
जिस ने दानिस्ता किया हो नज़र-अंदाज़ 'वसीम'
उस को कुछ याद दिलाएँ तो दिलाएँ कैसे
- वसीम बरेलवी
पहले ये तय हो कि इस घर को बचाएँ कैसे
क़हक़हा आँख का बरताव बदल देता है
हँसने वाले तुझे आँसू नज़र आएँ कैसे
जिस ने दानिस्ता किया हो नज़र-अंदाज़ 'वसीम'
उस को कुछ याद दिलाएँ तो दिलाएँ कैसे
- वसीम बरेलवी
पर उदासी के बिना रहा कैसे जाए?
शहर के दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले,
पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाव सहा कैसे जाए!
- अज्ञेय
पर उदासी के बिना रहा कैसे जाए?
शहर के दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले,
पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाव सहा कैसे जाए!
- अज्ञेय
हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ-सा कुछ
होता है यूॅं भी, रास्ता खुलता नहीं कहीं
जंगल-सा फैल जाता है खोया हुआ-सा कुछ
- निदा फ़ाज़ली
हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ-सा कुछ
होता है यूॅं भी, रास्ता खुलता नहीं कहीं
जंगल-सा फैल जाता है खोया हुआ-सा कुछ
- निदा फ़ाज़ली
सरों को काट के सरदारियाँ नहीं चलतीं
बुरा न मान अगर यार कुछ बुरा कह दे
दिलों के खेल में ख़ुद्दारियाँ नहीं चलतीं
जनाब-ए-'कैफ़' ये दिल्ली है 'मीर' ओ 'ग़ालिब' की
यहाँ किसी की तरफ़-दारियाँ नहीं चलतीं
- कैफ़ भोपाली
सरों को काट के सरदारियाँ नहीं चलतीं
बुरा न मान अगर यार कुछ बुरा कह दे
दिलों के खेल में ख़ुद्दारियाँ नहीं चलतीं
जनाब-ए-'कैफ़' ये दिल्ली है 'मीर' ओ 'ग़ालिब' की
यहाँ किसी की तरफ़-दारियाँ नहीं चलतीं
- कैफ़ भोपाली
हँसता चेहरा एक बहाना लगता है
सुनने वाले घंटों सुनते रहते हैं
मेरा फ़साना सब का फ़साना लगता है
- कैफ़ भोपाली
हँसता चेहरा एक बहाना लगता है
सुनने वाले घंटों सुनते रहते हैं
मेरा फ़साना सब का फ़साना लगता है
- कैफ़ भोपाली
ज़लज़लों के ख़ौफ़ से क्या घर बनाना छोड़ दें
घोंसले वीरान हैं अब वो परिंदे ही कहाँ
इक बसेरे के लिए जो आब-ओ-दाना छोड़ दें
- वसीम बरेलवी
ज़लज़लों के ख़ौफ़ से क्या घर बनाना छोड़ दें
घोंसले वीरान हैं अब वो परिंदे ही कहाँ
इक बसेरे के लिए जो आब-ओ-दाना छोड़ दें
- वसीम बरेलवी
मुझ तक मेरे हिस्से की धूप आने दे
मैं भी तो इस बाग़ का एक परिंदा हूँ
मेरी ही आवाज़ में मुझ को गाने दे
- वसीम बरेलवी
मुझ तक मेरे हिस्से की धूप आने दे
मैं भी तो इस बाग़ का एक परिंदा हूँ
मेरी ही आवाज़ में मुझ को गाने दे
- वसीम बरेलवी