Ravindra Sharma
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Ravindra Sharma
@ravindrasharma.bsky.social
Student, Books & Tea.

Jaipur, India.
दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
जैसे एहसाँ उतारता है कोई

दिल में कुछ यूँ सँभालता हूँ ग़म
जैसे ज़ेवर सँभालता है कोई

देर से गूँजते हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई
- गुलज़ार
December 23, 2025 at 11:57 AM
जिस तबाही से लोग बचते थे
वो सर-ए-आम हो रही है अब

शब ग़नीमत थी लोग कहते हैं
सुब्ह बदनाम हो रही है अब
- दुष्यंत कुमार
December 23, 2025 at 9:02 AM
कितना भव्य था
एक सूखते हुए वृक्ष की फुनगी पर
महज तीन-चार पत्तों का हिलना

उस विकट सुखाड़ में
सृष्टि पर पहरा दे रहे थे
तीन-चार पत्ते
- केदारनाथ सिंह
December 22, 2025 at 10:13 AM
शहर से एक तरफ़ दूर बहुत
आज रोया दिल-ए-महजूर बहुत

दूर है सुब्ह शब-ए-ग़म ऐ दिल
है सितारों मैं अभी नूर बहुत
- तिलोकचंद महरूम
December 19, 2025 at 9:32 AM
कौन सी बात है जो उस में नहीं
उस को देखे मिरी नज़र से कोई
- शहरयार
November 22, 2025 at 11:31 AM
छोड़ कर इक तेरे दर को दर-ब-दर जाएँ तो क्यूँ
हर किसी के सामने हम हाथ फैलाते नहीं
- शबाना नज़ीर
November 9, 2025 at 4:55 AM
मिरी तलाश ब-दस्तूर अब भी जारी है
वो मिल गया है मैं खोया हुआ सा लगता हूँ

मिरी हँसी से उदासी के फूल खिलते हैं
मैं सब के साथ हूँ लेकिन जुदा सा लगता हूँ

तमाम रात बरसती है रेत पर शबनम
मैं अपने चाँद से जब भी ख़फ़ा सा लगता हूँ
- बशीर बद्र
October 29, 2025 at 4:24 AM
इक हवेली में चहकते हुए पंछी की तरह
तेरी आवाज़ अभी क़ैद है दरबारों में

धूप की आग में हँसने की अदा क्या जानें
जंगली फूल कहाँ आप के गुलज़ारों में
- बशीर बद्र
October 6, 2025 at 5:03 AM
ऐ आवारा यादो फिर ये फ़ुर्सत के लम्हात कहाँ
हम ने तो सहरा में बसर की तुम ने गुज़ारी रात कहाँ

मेरी आबला-पाई उन में याद अक्सर की जाती है
काँटों ने इक मुद्दत से देखी थी कोई बरसात कहाँ
- राही मासूम रज़ा
September 22, 2025 at 1:05 AM
ज़िंदगी ने मुझे अपने घर बुलाया
और मेहमान नवाज़ी करना भूल गयी
- अमृता प्रीतम
September 21, 2025 at 5:28 AM
मैं कोई पचास-पचास बरसों से
कविताएँ लिखता आ रहा हूँ
अब कोई पूछे मुझसे
कि क्या मिलता है तुम्हें ऐसा
कविताएँ लिखने से

जैसे अभी दो मिनट पहले
जब मैं कविता लिखने नहीं बैठा था
तब काग़ज़ काग़ज़ था
मैं मैं था
और कलम कलम
मगर जब लिखने बैठा
तो तीन नहीं रहे हम
एक हो गए
- भवानीप्रसाद मिश्र
September 14, 2025 at 4:25 PM
यही जाना कि कुछ न जाना हाए
सो भी इक उम्र में हुआ मालूम
- मीर तक़ी मीर
September 14, 2025 at 3:55 PM
बस, हाथ भर की दूरी पर है,
वह जिसे पाना है।
ग़लती उसी दूरी को समझने में थी
- कुॅंवर नारायण
September 10, 2025 at 12:41 PM
कुछ है कि जो घर दे नहीं पाता है किसी को
वर्ना कोई ऐसे तो सफ़र में नहीं रहता
- वसीम बरेलवी
August 31, 2025 at 5:41 AM
कहीं तो गर्द उड़े या कहीं ग़ुबार दिखे
कहीं से आता हुआ कोई शहसवार दिखे

कोई तिलिस्मी सिफ़त थी जो इस हुजूम में वो
हुए जो आँख से ओझल तो बार बार दिखे
- गुलज़ार
July 25, 2025 at 11:30 AM
अब किसी से भी शिकायत न रही
जाने किस किस से गिला था पहले
- निदा फ़ाज़ली
July 17, 2025 at 11:27 AM
हम ने समझा था मौसम की बे-रहमियों को भी ऐसा कहाँ
इस तरह बर्फ़ गिरती रहेगी कि दरिया ठहर जाएँगे
- राजेन्द्र मनचंदा बानी
July 11, 2025 at 3:32 AM
अँधेरी रात है मैं हूँ अकेला दीप जलता है
हवा जग जग के सोती है पथिक अब कौन चलता है

न कुछ भी धूल धक्कड़ हो तो पथ कैसे चला जाए
कहा है चिकने पत्थर पर क़दम जा कर फिसलता है
- त्रिलोचन
June 28, 2025 at 11:59 AM
घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत ब'अद का है
पहले ये तय हो कि इस घर को बचाएँ कैसे

क़हक़हा आँख का बरताव बदल देता है
हँसने वाले तुझे आँसू नज़र आएँ कैसे

जिस ने दानिस्ता किया हो नज़र-अंदाज़ 'वसीम'
उस को कुछ याद दिलाएँ तो दिलाएँ कैसे
- वसीम बरेलवी
June 16, 2025 at 9:08 AM
मन बहुत सोचता है कि उदास न हो
पर उदासी के बिना रहा कैसे जाए?

शहर के दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले,
पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाव सहा कैसे जाए!
- अज्ञेय
June 13, 2025 at 5:51 PM
देखा हुआ-सा कुछ है तो सोचा हुआ-सा कुछ
हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ-सा कुछ

होता है यूॅं भी, रास्ता खुलता नहीं कहीं
जंगल-सा फैल जाता है खोया हुआ-सा कुछ
- निदा फ़ाज़ली
June 8, 2025 at 6:41 PM
क़बीले वालों के दिल जोड़िए मिरे सरदार
सरों को काट के सरदारियाँ नहीं चलतीं

बुरा न मान अगर यार कुछ बुरा कह दे
दिलों के खेल में ख़ुद्दारियाँ नहीं चलतीं

जनाब-ए-'कैफ़' ये दिल्ली है 'मीर' ओ 'ग़ालिब' की
यहाँ किसी की तरफ़-दारियाँ नहीं चलतीं
- कैफ़ भोपाली
June 6, 2025 at 8:10 AM
सच तो ये है फूल का दिल भी छलनी है
हँसता चेहरा एक बहाना लगता है

सुनने वाले घंटों सुनते रहते हैं
मेरा फ़साना सब का फ़साना लगता है
- कैफ़ भोपाली
June 5, 2025 at 11:44 AM
हादसों की ज़द पे हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें
ज़लज़लों के ख़ौफ़ से क्या घर बनाना छोड़ दें

घोंसले वीरान हैं अब वो परिंदे ही कहाँ
इक बसेरे के लिए जो आब-ओ-दाना छोड़ दें
- वसीम बरेलवी
June 1, 2025 at 5:11 AM
अपने साए को इतना समझाने दे
मुझ तक मेरे हिस्से की धूप आने दे

मैं भी तो इस बाग़ का एक परिंदा हूँ
मेरी ही आवाज़ में मुझ को गाने दे
- वसीम बरेलवी
June 1, 2025 at 5:11 AM